सिसकता किसान
सिसकता किसान
किसान को कहते अन्नदाता
हम उनकी क्यों न सुनें
स्वयं भूखा रहकर भी
सबको भोजन देता है
किसान कितनी मेहनत से
धरती से फसल उगाता
साल भर मेहनत करता
उगाता है वह सोना
फिर भी कर्ज में डूबा है
अब बाकी क्या है बोना
गीत छपे महान किसान
पर उसकी दशा तो जान
आधुनिकता ने भुला दिया
छूटे सुर की है वो तान
बचा सको तो बचा लो
वह है सिसकता किसान
कहते हैं अन्नदाता जिसको
पेड़ो से क्यूँ लटक रहे
जो जीवित हैं वो भी
मृत्यु को हैं भटक रहे
सूखा, ॠण, फसल की कीमत
पीड़ा कितनी गिनाये वो
अब तो समझो उसका दर्द
बोलो कहाँ जाये वो
अन्न उपजाने वाले को भी
जीने का अधिकार है
सबका पेट भरने वाले के
मुँह में भी निवाला दो !
