Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

सिसक रही हूँ

सिसक रही हूँ

1 min 264 1 min 264

आज, सिसक रही हूं, मैं  

यहाँ 

इस निर्जन सूने पर्वत

शिखर पर 

क्यों,

क्योंकि, एक नारी हूं, मैं

कब तक,

बचाती रहूंगी, मैं

अपनी -अस्मत को 

समाज के इन दरिंदों, से 

जो, आज के दौर में

हर समय और हर जगह 

मौजूद है यहाँ,


इस निर्जन सूने पर्वत

शिखर पर 

कुछ तो सुकून मिलेगा 

कुछ पल को,

क्योंकि,

आज नहीं तो, कल को 

वो, यहाँ भी आ जायेंगे 

लूटने को, अस्मत,

क्योंकि, एक नारी हूं, मैं ...


  



Rate this content
Log in

More hindi poem from शशि कांत श्रीवास्तव

Similar hindi poem from Tragedy