सिक्के
सिक्के
शीर्षक: सिक्के
यूं तो मेरे ज़मीर को
खरीदने वालों का तांता लगा है
पर हमने भी बेदाग रहने का
खुद से अहद कर रखा है
उन्हें सिक्कों का शौक बड़ा हैं
उछालते हैं, खरीदते हैं, बिकते हैं अक्सर
हमें अपनी मुफलिसी से लगाव बहुत है
खुश है, इत्मीनान है, जो है मयस्सर
यह चोला एक दिन हम सबने
उतार के जाना है उस पार
भवसागर है अति क्रूर जहां
न कश्ती है, न ही पतवार
कर्म अपने ही संग जाने है
क्यों करें विधि के विधान से खिलवाड़
नेकी के गर बीज बोएंगे
खुले मिलेंगे वहां के किवाड़
सिक्कों का बिछा बिछौना
यूं तो दिखता है बड़ा ज़ोरदार
पर मखमली एहसास से है महरूम
और दाग़दार कर दे किरदार
यह जिंदगी चंद लम्हों की है
कौन सा सवेरा आखिरी हो, कौन जाने
निस्वार्थ हो भावना, और संतोषी मन
सिक्के है लालसा, संग किसके जाने
