सीरियल किलर
सीरियल किलर
बनूं सीरियल किलर मैं भी,
हर रोज उनको एक - एक कर,
चुन-चुन कर सदा मारता रहूं।
जब तक खत्म न हो जाए सारे,
बहुत तड़पाया और सताया है।
जिंदगी मेरी कर दी है, अब दूभर,
न चैन मिलती, न करार आता है।
न कभी शांत होता है मेरा मन,
हर एक पल परेशान करता है।
हर रोज मारूंगा एक-एक को,
सही है मेरा लक्ष्य और जुनून।
सताया और बहुत रुलाया है,
मुझे अब बिल्कुल ही, जीने नहीं देता।
मैं तंग हूं, दुखी और परेशान कर दिया,
इसके संग मेरी, बिल्कुल न निबहेगी।
कैसे कहूं, मैं दुखड़ा अपना,
बताने में भी, शर्म लगती है।
इनके साथ, अब तो कभी नहीं,
कभी भी बिल्कुल नहीं पटती।
इसने मुझे नोचा है, रोज-रोज,
हर रोज खुब जलील किया है।
अब तो इन सबों की आहट भी,
मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है।
कितना बताऊं, इन्होंने कष्ट दिया,
पल -पल हर - रोज दिया धोखा ।
कंगाल कर, मेरा वक्त नष्ट किया,
मेरा दुश्मन दुनिया में, कोई इंसान नहीं है।
अब यहां मेरे सिवाय कोई नहीं रहेगा,
देखता हूं, मैं सब में हूं, सभी है मुझ में।
जो भी मुझे दिखता मेरा प्रतिरूप ही है।
पहले 'काम' मारूंगा, फिर 'क्रोध' की बारी,
मद-मोह-लोभ का क्रम से होगा खात्मा।
धीरे-धीरे मरेंगे सभी, तृष्णा और वासना,
चुन-चुन कर मारूंगा, इंद्रियों के विकार।
रूप- रस- गंध - शब्द और स्पर्श सुख का,
एक- एक कर सभी को, करूंगा संहार।
हे गुरुदेव आप मुझे, शक्ति इतना देना,
इनको मारने पर मेरा मन, दुखी नहीं होए।
यह सारी ऐसी जैसी, मानो हों रक्तबीज,
मारने पर फिर, जीवित खड़ी हो जाती है।
पर मैं भी छोड़ूंगा, नहीं कोई भी प्रयास,
करता रहूं नित्य, इन सबका ही विनाश।
दीजिए मुझे अब, मैं भी पचा लूं ब्रह्मज्ञान,
बस लीन हो जाऊं, सारे नजर ही ना आए।
यह तो है मेरी बात, आप भी करें सहयोग,
क्योंकि कभी अलग नहीं मैं और आप,
एक ही गौ माता और बाल्टी का दूध,
बस अलग-अलग छोटे बर्तनों में रखा है।
