STORYMIRROR

Ajay Singla

Classics

4  

Ajay Singla

Classics

श्रीमद्भागवत -८५ ; प्रचेताओं को श्री विष्णु भगवान का वरदान

श्रीमद्भागवत -८५ ; प्रचेताओं को श्री विष्णु भगवान का वरदान

3 mins
201

विदुर जी पूछें कि हे ब्राह्मण

प्राचीनबर्हि के जो पुत्र थे

जिन्होंने सिद्धि प्राप्त की थी

रूद्र गीत से हरि स्तुति करके |


स्तुति से मोक्ष तो पाया ही होगा

पर इससे पहले लोक - परलोक में

उन्होंने क्या कुछ पाया था

सुनूं आपसे इच्छा मेरी ये |


मैत्रेय जी कहे कि हे विदुर जी

पिता की आज्ञा से प्रचेताओं ने

समुन्द्र में खड़े हो तपस्या कर

प्रसन्न हरि को किया रूद्र गीत से |


दस हजार वर्ष तक तप किया

प्रसन्न हो नारायण प्रकट हुए

दिव्य प्रभा से सभी दिशाओं का

अन्धकार वो दूर कर रहे |


प्रचेताओं को निहारते हुए हरि

गंभीर वाणी में उन्हें कहने लगे

राजपुत्रो, तुम्हारा कल्याण हो

परस्पर बड़ा प्रेम, स्नेह तुममें |


एक ही धर्म का पालन कर रहे

प्रसन्न मैं तुम्हारे इस सौहार्द से

तुम सभी एक समान हो

तुम सब अब वर मांगो मुझसे |


जो पुरुष सायंकाल के समय

प्रतिदिन तुम्हारा स्मरण करेगा

प्रेम, स्नेह अपने भाईओं से

अपने समान ही होगा उसका |


समस्त जीवों के प्रति मित्रता

उस पुरुष के मन में होगी

मेरी कृपा से तुम्हारी कीर्ति

सारे लोकों में फैल जाएगी |


विलक्षण एक पुत्र होगा तुम्हे

गुणों में ब्रह्मा के समान वो

और अपनी संतान से वही

पूर्ण करे तीनों लोकों को |


भगवान कहें, हे राजकुमारो

तपोनाश के लिए कण्डू ऋषि के

इंद्र ने भेजी थी जो अप्सरा

एक कन्या उत्पन्न हुई थी उससे |


अप्सरा प्रम्लोचा उसे छोड़कर

चली गयी थी स्वर्गलोक को

तब व्रृक्षों ने उस कन्या को

पाला पोसा, बड़ा किया उसको |


जब भूख से व्याकुल होकर

वो कन्या रोने लगी थी

चद्र्मा ने दयावश उसके

मुँह में तर्जनी ऊँगली दे दी थी |


तुम्हारे पिता जो मेरी भक्ति कर रहे

संतान उत्पत्ति की आज्ञा तुमहे दी

उस कन्या से विवाह करो और

जाओ अब तुम सब शीघ्र ही |


तुम सब एक ही धर्म में तत्पर 

तुम्हारा स्वाभाव भी एक सा ही 

धर्म, स्वाभाव उस सुंदरी का 

है बिलकुल तुम्हारे जैसा ही।


तुम सब की वो पत्नी होगी 

समान अनुराग होगा सभी से 

तुम दस लाख दिव्य वर्ष तक

मेरी कृपा से भोग भोगोगे।


अंत में तुम मेरी भक्ति से 

ह्रदय शुद्ध हो जाने पर 

लोक परलोक से मुक्त होओगे 

अधिकार पाओगे मेरे परमपद पर।


मैत्रेय जी कहें, हे विदुर जी 

प्रचेताओं का, हरी दर्शन से 

रजोगुण, तमोगुण नष्ट हो गया 

हाथ जोड़ प्रभु से कहने लगे।


भक्तों का आप दुःख दूर हैं करते 

नामों का निरूपण वेद भी करें 

आप का वेग तो बढ़कर है 

मन और वाणी के वेग से।


मोक्ष का मार्ग दिखलाते आप हैं 

प्रसन्न हैं हमपर, ये ही कृपा है 

इससे बढ़कर और क्या चाहिए 

अभीष्ट वर ये प्रसन्नता ही है।


फिर भी एक वर चाहिए आपसे 

जब तक माया से मोहित हो 

इस संसार में भ्रमण करें हम 

संग हरि भक्तों का प्राप्त हो।


आप के प्रिय सखा शंकर के 

क्षणभर के समागम से ही तो 

आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ 

नमस्कार हम करते आपको।


मैत्रेय जी कहें कि प्रचेताओं ने 

भगवान हरि की स्तुति थी की जब 

'तथास्तु' भगवान ने कहा था उन्हें 

अपने धाम को चले हरि तब।


तब प्रचेता समुन्द्र से निकले 

देखें ढकी हुई पृथ्वी सारी 

अनेकों वृक्षों ने ढक लिया उसको 

वृक्षों पर वो कुपित हुए भारी।


तब उन्होंने वृक्षों, लताओं को 

धरती पर से ख़त्म करने को 

मुख से वायु, अग्नि को छोड़ा 

वृक्षों को भस्म करने को।


ब्रह्मा जी ने जब ये देखा 

समझाने वहां पर आये उनको 

शांत किया उन प्रचेताओं को 

वहां आये वृक्ष, बच गए थे जो।


ब्रह्मा जी के कहने पर फिर 

उस कन्या को वृक्ष वहां ले आये 

प्रचेताओं को कन्या दे दी 

विवाह किया उससे प्रचेताओं ने।


मारिषा नाम की उस कन्या से 

दक्ष ने फिर से जन्म लिया था 

महादेव की अवज्ञा के कारण 

पूर्व शरीर को त्याग दिया था।


चाक्षुक मन्वन्तर के आने पर 

प्रजा उत्पन्न की इन्हीं दक्ष ने 

तेज छीन लिया था तेजस्वीयों का 

जन्म लेते ही अपनी कान्ति से।


कर्म करने में बड़े दक्ष थे 

इसलिए नाम दक्ष पड़ा था 

ब्रह्मा जी ने नायक बनाया 

उन्हें बाकी प्रजापतिओं का।


सृष्टि की रक्षा के लिए 

आज्ञा दी ब्रह्मा जी ने उन्हें 

उन्होंने फिर नियुक्त किया था 

मरीचआदि को अपने कामों में।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics