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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत -२५ ;राजा परीक्षित के विविध प्रश्न व उनके उत्तर

श्रीमद्भागवत -२५ ;राजा परीक्षित के विविध प्रश्न व उनके उत्तर

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परीक्षित कहें मैं जानना चाहूँ जो

ब्रह्मा ने उपदेश दिया नारद को

निर्गुण भगवान के गुणों का वर्णन

उन्होंने फिर ये किया किस किस को।


शुकदेव जी आप उपदेश दीजिये

कैसे आसक्ति रहित करूं मन को

इसे कृष्ण में तन्मय करके

छोडूं शरीर, अपने इस तन को।


जिनकी कृपा से ब्रह्मा सृष्टि रचें

नाभिकमल से उनके जन्म लें

फिर भी दर्शन न कर सकें उनका

किस रूप में वो हैं शयन करें।


भूत, भविष्य और वर्तमान का

अनुमान कैसे किया जाता है

विविध कर्मों से सब जीवों की

क्या गतियां, क्या फल होता है।


उत्पति हो जीवों की कैसे

ब्रह्माण्ड का परिणाम बताएं

महांपुरुषों का चरित्र कहिये

वर्णाश्रम का धर्म सुनाएं।


भगवान के अवतारों का चरित्र

साधारण और विशेष धर्म मनुष्यों के

वेद, उपवेद, धर्मशास्त्र क्या हैं

स्वरुप इतिहास पुराणों का कहिये।


प्राणी की उत्पत्ति कैसे हुई

स्थिति और प्रलय है होती कैसे

भगवान तो हैं परम स्वतंत्र

क्रीड़ा करें वो माया से कैसे।


जब ये प्रश्न किये परीक्षित ने

सुनकर शुकदेव जी बहुत प्रसन्न हुए

जो शास्त्र प्रभु सुनाया ब्रह्मा को

वही भागवत वो परीक्षित से कहें।


ब्रह्मा जी ने की तपस्या

भगवान प्रसन्न हुए थे उनसे

अपने रूप का दर्शन कराया

उपदेश दिया, जो कहूँ मैं तुमसे।


कमल पर बैठे ब्रह्मा जी

सृष्टि रचने की इच्छा हुई

पर जो ज्ञान दृष्टि चाहिए थी

उनको प्राप्त नहीं थी हुई।


यही चिंता जब कर रहे थे

तप शब्द दो बार सुना वहां

ब्रह्मा चारों तरफ थे देखें

दिखाई कोई न पड़ा उन्हें वहां।


मन को तपस्या में लगा दिया

सहस्त्र वर्ष तक की तपस्या

इस तप से प्रसन्न हुए प्रभु

दर्शन कराया उन्हें अपने लोक का।


उस लोक में ना कलेश कोई

ना कोई मोह, ना कोई माया

रजो, तमो, सत्वगुण भी नहीं

ना ही काल वहां जा पाया।


भगवान के पार्षद निवास करें वहां

चार भुजाएं हैं सभी की

उसी वैकुण्ठ में लक्ष्मी जी भी

प्रभु चरणकमलों की सेवा करतीं।


ब्रह्मा जी ने देखा वहां पर

भगवान स्वयं विराजमान हैं

मुख कमल मुस्कान से शोभित

मोहक और मधुर चितवन है।


सुंदर चार भुजाएं हैं और

कंधे पर पीताम्बर है उनके 

मूर्तिमान हो पच्चीस भक्तिआं

चारों और खड़ी हैं उनके।


दर्शन पाकर आनन्दित हुए ब्रह्मा

पुलकित शरीर उनका हो गया

नेत्रों से प्रेमाश्रु छलक गए

चरणकमलों में तब प्रणाम किया।


भगवान् प्रसन्न हुए, मुस्कुराये वो

कहा तब उन्होंने ब्रह्मा से

ह्रदय में वेदों का ज्ञान तुम्हारे

जो चाहो वर मांग लो मुझसे।


मेरी ही वाणी थी वो

तपस्या के लिए कहा था जिसने

तपस्या से ही संसार की सृष्टि करूं

उसी से ही लीन करूँ अपने में।


ब्रह्मा कहें कि आप विराजमान हैं 

अन्तकरण में सभी प्राणीयों के

कृपा करें कि मैं जान सकूं

निर्गुण, सगुन रूप आपके।


माया से आप इस जगत की

उत्पत्ति, पालन, संहार करते हैं

इस सब को करने के लिए ही

अनेकों रूप धारण करते हैं।


कैसे करते हैं आप ये 

ज्ञान दीजिये मुझे, कृपा करें ये 

सृष्टि की रचना करते हुए 

बंध ना जाऊं कहीं मैं अभिमान में।  


भगवान कहें मेरा विस्तार जो 

गुण लीलाएं जो हैं मेरी 

मेरे लक्षण और मेरे रूप हैं 

अनुभव करो सबको तुम वैसे ही।  


सृष्टि के पूर्व केवल मैं था 

सृष्टि नहीं जहाँ, वहां भी मैं हूँ 

सृष्टि के रूप में जो प्रतीत हो 

जो कुछ बचेगा, वह भी मैं हूँ।  


शरीर की दृष्टि से हम देखें 

आत्मा के रूप में मैं प्रवेश करूँ 

आत्मा की दृष्टि से देखें तो 

इसमें प्रविष्ट मैं नहीं भी हूँ।  


तुम अपनी समाधी के द्वारा 

मुझ मे पूरी निष्ठा कर लो 

सृष्टि रचना करते हुए इससे 

मोह नहीं तब होगा तुमको।  


शुकदेव जी कहें कि ब्रह्मा जी को 

इस प्रकार उपदेश दिया था 

देखते देखते फिर भगवान ने 

अपने रूप को छिपा लिया था।  


ब्रह्मा जी ने प्रणाम किया और 

पहले कल्प में जैसी श्रुष्टि थी 

प्रभु के चरणों का ध्यान कर 

वैसी सृष्टि की रचना कर दी।  


यम नियमों को धारण किया था 

एक बार जब ब्रह्मा जी ने 

उनके पुत्र नारद जी ने 

उनकी सेवा की, बड़े संयम से।  


ब्रह्मा जी बड़े संतुष्ट हुए जब 

नारद जी ने तब प्रश्न किये थे 

उन प्रश्नों का उत्तर देते हुए 

ब्रह्मा जी ने उपदेश दिया ये।  


नारद को दस लक्षण वाला ये 

भागवत पुराण सुनाया उन्होंने 

जिसका स्वयं भगवान हरि से 

उपदेश था पाया उन्होंने।  


नारद ने मेरे पिता को सुनाया 

जब वो सरस्वती तट पर बैठे थे 

आपके प्रश्नों का उत्तर मैं 

देता हूँ भागवत के रूप में।  




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