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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

Classics


श्रीमद्भागवत -212; धेनुकासुर का उद्धार और ग्वालबालों को कालिया नाग के विष से बचाना

श्रीमद्भागवत -212; धेनुकासुर का उद्धार और ग्वालबालों को कालिया नाग के विष से बचाना

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श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

जब बलराम और श्री कृष्ण ने 

छठे वर्ष में प्रवेश किया तो 

स्वीकृति मिल गयी गायें चराने की उन्हें।


सखा ग्वालबालों के साथ में 

गायें चराने वृन्दावन जाते 

वृन्दावन को पावन करते थे 

वे अपने चरणकमलों से।


बड़े सुंदर सरोवर इस वन में 

सुंदर पक्षी चहक रहे थे 

विहार करने का संकल्प लिया 

उसे देख मन ही मन भगवान ने।


तब उन्होंने मुस्कुराते हुए 

बड़े भाई बलराम जी से कहा 

कृष्ण कहें ‘ हे देवशिरोमने ‘

पूजा आपकी करें सभी देवता।


सुंदर पुष्प, फल आदि लेकर 

अपनी डालियों में ये वृक्ष भी 

आपके चरणकमलों में झुक रहे 

नमस्कार कर रहे ये सभी।


इसी सौभाग्य के लिए तथा 

अज्ञान का नाश करने के लिए ही 

वृन्दावन धाम में इन्होंने 

वृक्ष योनि है ग्रहण की।


यद्यपि आप इस वृन्दावन में 

छिपाकर अपने ऐश्वर्य रूप को 

बालकों की सी लीला कर रहे 

फिर भी आपके श्रेष्ठ भक्त जो।


अपने इष्टदेव को पहचानकर 

यहाँ भी प्रायः भोरों के रूप में 

आपके भजन में लगे रहते हैं 

आपके यश का निरंतर गान करें।


देखिये, ये हंस दर्शन से आपके 

आनंदित होकर हैं नाच रहे 

हरिनियाँ आपके प्रति प्रेम प्रकट कर 

आपको प्रसन्न कर रहीं वे।


ये कोयलें अपनी मधुर ध्वनि से 

स्वागत कर रहीं आपका 

स्पर्श प्राप्त कर धन्य हो रही 

भूमि यहाँ की, आपके चरणों का।


यहाँ के वृक्ष, लताएं, झाड़ियां 

स्पर्श अंगुलियों का पाकर आपके 

अपना अहोभाग्य मान रहीं 

नदी, पर्वत कृतार्थ हो रहे।


श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

परम सुंदर वृन्दावन को 

देखकर आनंद हुआ था 

इस प्रकार श्री कृष्ण को।


अनेकों प्रकार की लीलाएं करने लगे 

राजहंसों के साथ कूँजते 

कभी नाचते हुए मोरों के 

साथ नाचने लगते वे।


कभी दूर गए पशुओं का नाम ले 

प्रेम से पुकारते उनको 

पक्षियों की बोली निकालें कभी 

बाघ, सिंह की गर्जना सुनते तो।


डरे हुए जीवों के समान 

स्वयं भी भयभीत की सी लीला करते 

बलराम जी जब थककर सो जाते 

पैर दबाने लगते उनके।


कुश्ती लड़ते अन्य ग्वालबालों से 

थकने पर लेटते उनकी गोद में 

कोई महात्मा ग्वालबाल बने हुए 

उनके चरण दबाने लगते थे।


दूसरे निष्पाप बालक भी उनको 

पत्तों से पंखा झलते उन्हें 

सबसे ऐश्वर्य स्वरूप छिपाया था 

भगवान ने अपनी योगमाया से।


गोपालबालों की सी ही 

लीलाएं करते कृष्ण थे 

ऐसा होने पर भी कभी कभी 

प्रकट हो जाया करतीं वे।


सखाओं में बलराम कृष्ण के 

प्रधान गोप बालक एक थे 

श्रीदामा उनका नाम था 

एक दिन कृष्ण को कहा उन्होंने।


सुबल और स्तोककृष्ण ( छोटे कृष्ण ) भी 

उस समय उनके साथ थे 

कहें बलराम को, बाहुबल की 

कोई थाह नहीं है आपके।


मनमोहन कृष्ण जी !, दुष्टों को 

नष्ट करना स्वभाव आपका 

यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर 

भारी वन एक बहुत बड़ा।


पाँत के पाँत ताड़ के वृक्ष 

भरे पड़े हैं उस वन में 

बहुत सारे ताड़ के फल वहां 

लगातार गिरते ही रहते।


परन्तु वहां एक दुष्ट दैत्य 

रहता है धेनुक नाम का 

रोक लगा दी उन फलों पर उसने 

गधे के रूप में वो वहां रहता।


स्वयं बड़ा ही बलवान वो 

बहुत से साथी दैत्य भी रहते 

रहते सभी गधे के ही रूप में 

बालकों, मनुष्यों को वो खा जाते।


मनुष्य और पशु पक्षी सब 

वहां नहीं जाते उसके डर से 

फल बड़े सुगन्धित पेड़ों के 

कभी न खाये हैं पर हमने।


श्री कृष्ण !, उन फलों की सुगंध 

मंद मंद फैल रही वन में

हमारा मन मोहित हो गया 

उन फलों की सुगंध से।


तुम हमें वो फल अवश्य खिला दो 

दाऊ भैया, हमें बड़ी अभिलाषा 

हमें अवश्य ही चलना चाहिए 

आपको रुचे, तो वहां।


अपने सखा ग्वालबालों की 

बात सुनी कृष्ण, बलराम ने 

तालवन को जाने का निश्चय किया 

उनको प्रसन्न करने के लिए।


ताड़ के पेड़ों को बांहों से 

पकड़कर बलराम जी ने जब 

जोर से हिलाया तो बहुत से 

फल नीचे गिर गए तब।


जब गधे रुपी दैत्य ने 

फल गिरने का शब्द सुना तो 

बाकी दैत्यों को साथ ले 

बलराम जी की और दौड़ा वो।


धेनुकासुर बड़ा बलवान था 

वहां आते ही उसने फिर 

दुलत्ती मारी पिछले पैरों से 

बलराम जी की छाती पर।


रेंकता हुआ पीछे हटा और 

दूसरी दुलत्ती मारने को हुआ तो 

बलराम जी ने एक ही हाथ से 

पैर पकड़ लिए उसके दोनों।


आकाश में उसे घुमाकर 

मारा ताड़ के पेड़ पर उसे 

प्राण पंखेरू उड़ गए थे 

घुमाते समय ही उस गधे के।


वह वृक्ष और दूसरे वृक्ष भी 

उसके गिरने की चोट से 

एक एक कर गिर पड़े थे 

बलराम जी के लिए खेल था एक ये।


धेनुकासुर के भाई बंधू सब 

टूट पड़े उनपर देख ये 

ताड़ वृक्षों पर दे मारा सभी को 

बलराम जी और श्री कृष्ण ने।


उस समय जो भूमि वहां 

पट गयी ताड के फलों से 

दैत्यों के शरीर पड़े वहां 

और सभी वृक्ष टूटे हुए।


जब धेनुकासुर मर गया 

लोग निडर हो गए उस दिन से 

वन में जाकर ताड़ फल खाते

पशु भी वहां घास चरने लगे।


दोनों भाई तब व्रज में आये 

श्री कृष्ण मुरली बजा रहे 

ग्वालबाल गान करते हुए 

उन दोनों का, पीछे पीछे चले।


मुरली की धुन सुन गोपियाँ  

बाहर निकल आयीं व्रज से 

श्री कृष्ण के दर्शन को तरसतीं 

उनकी आँखें न जाने कब से।


माता यशोदा और रोहिणी जी का 

हृदय उमड़ रहा वात्सल्य स्नेह से 

स्नान कराया, वस्त्र पहनाये 

स्वादिष्ट भोजन कराया था उन्हें।


वृन्दावन में कई लीला कीं 

एक दिन ग्वालबालों के साथ में 

यमुना जी के तट पर गए 

बलराम तब उनके साथ नहीं थे।


जेठ आषाढ़ की घास से गायें और 

ग्वालबाल पीड़ित हो रहे 

प्यास से उनके कंठ सूख गया 

यमुना जी के पास पहुँच गए।


विषैला जल यमुना का पी लिया 

उन्हें इस बात का ध्यान ही न रहा 

विषैले जल पीने से गोप सब 

प्राणहीन हो गिर पड़े वहां।


कृष्ण ने जीवित कर दिया 

अपनी कृपादृष्टि से उन्हें 

चेतना आने पर आश्चर्यचकित हो 

कृष्ण की और देखने लगे वे।




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