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Anil Pandit

Abstract

3  

Anil Pandit

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शजर पर परिंदा

शजर पर परिंदा

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वो  जो परिंदा

शजर पर बैठा है

सब बात जानकर भी

अनजान बन बैठा है

 

पता है उसे  भी

समंदर की लहरे

ऊंची उठती है

दिल में कसक सी

बाकी रह जाती है

 

परिंदा तो परिंदा है

उड़ ही जायेगा एक दिन

लेकिन शजर तो उसे

याद करता रहेगा

हर एक दिन

 



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