शिकवे (गजल)
शिकवे (गजल)
शिकवे करूँ या शिकायत करूँ, दोनों समाये हैं दिल में,
यह मुहब्बत है या नफ़रत, खयालात टकराते हैं हर पल दिल में।
जुल्मदार कहूँ तो नाइंसाफी होगी, चूंकि मेरे महबूब को मुझसे इनायत भी है।
कुछ वादे कुछ कसमें खायी थीं जिसने इक दिन, लगता था उनके लहजे में सियासत भी थी।
चाहते तो बना लेते उनको अपना, मगर दिल में हमारे कुछ शराफत भी थी।
लेकर कुछ मुद्दे जब खड़े हुए हम, जिन मुद्दों पर दिल में बगावत भी थी।
माना की वो वादों के झूठे थे मगर उनकी बातों में कुछ सलामत भी थी।
समझते थे सभी जिनको संगदिल मगर उनमें फूलों जैसी नजाकत भी थी।
मत कर गिला, शिकवा किसी पर बिन सोचे समझे सुदर्शन क्योंकि भूल जाना उनकी पुरानी आदत थी,
शिकवे, शिकायतें खत्म तब तक नहीं हुए, जब तक अपनों में मिलने की आदत थी।
बदल चुके हैं ढंग तरीके दुनियादारी के, रूठना, मनाना तो पुरानी आदत थी।
क्यूँ करते हो हल्का अपने को अपनों से रूठ कर, क्योंकि अपनों के घर तो, बैगानों की बैठक थी।

