शिक्षा
शिक्षा
समय समय बदलते मूल्यांकन
मुझे खुद ही अचंभित करता है ।
गुरुकुल जो आश्रम तक था
आज कमरों में बंद मिलता है
गुरु दक्षिणा तक में था संतोष
अब तो पैसों से शिक्षा मिलता है।
पुत्र और पिता का था रिश्ता
अब वो रिश्ता कहां दिखता है।
उच्च शिक्षा को तरस जाते गरीब के बच्चे
उतने पैसे गरीब कमा कहां पाता है।
गुरुकुल में ज्ञान था मिलता सब
आज तो शिक्षा व्यवसाय दिखता है।
सरकार से है विनती हमारी
शिक्षा कर दो निशुल्क सारी
सब लोग हो पाए शिक्षित
गरीब अमीर में न हो दूरी।
