शीर्षक-वो निर्मोही साजन
शीर्षक-वो निर्मोही साजन
शीर्षक-वो निर्मोही साजन
टूटा दिल ये रोता है रे
वो निर्मोही साजन
बीत गया दिन तू न आया
शरद ये पतझड़ सावन।।
मैं विरही हूं प्रेम दीवानी
बहुत न हुई सयानी
होठ हमारे सूख गये हैं
अंखियां झरती पानी
चला गया तू क्या? बतलाऊ
कैसे सूना आंगन।।
उलझ गये हैं केश हमारे
सांस चले नित आस तुम्हारे
भूल गया दिल क्या? वह तेरा
छीन लिया जो मेरा सवेरा
छूट गया सब खेल हमारा
जो होता मनभावन।।
मृत्यु गोद में न लेती है
न साजन तुझको देती है
फंसी भंवर में नैया मेरी
कैसे छोड़ूं राहें तेरी
खड़ी यहीं पर जीवन त्यागू
आंख न त्यागे जागन।।
