सच्चा इश्क़
सच्चा इश्क़
हमने तो समझा था
सच्चे इश्क में
दिल इधर टूटता है तो
आवाज़ उसको सुनाई देती है
दर्द इधर होता है तो
आँखे उसकी नम होती है
खुशी इधर मिली है तो
लब उसके मुस्कराते है
हर आहट की, हर खुशबू की
पहचान उसको होती है
दुनिया से लड़ जाने को
हर गम सह जाने को
मैंने तो सच्चा इश्क़ माना था
रंगो से भरी दुनिया इश्क़ की
इसके रंग में रंग जाने को
मैंने तो सच्चा इश्क़ माना था
ना आवाज़ सुनी
ना दर्द ही समझा
दिल तक नहीं,
तो लब तक कैसे आती उसके
ख़ुशी मेरी मुस्कराने को
ये तो मात्र एक कल्पना थी
मेरे सच्चे इश्क़ की
बनायीं हुई एक तस्वीर थी
जिसको टूट ही जाना था
क्योकि इश्क़ ने भी
बदली दुनिया के साथ
भाषा अपनी बदल दी थी
लगता जैसे परियो की
या किताबो की कहानी है
दिल की राह लगती आसान है
पर अनजानी है
इश्क़ भी आजकल का
समाज और दुनियादारी में
उलझ गया जैसे
निकल कभी न पायेगा
आजकल के दौर में
या हमेशा से ही ,
जानती ही नहीं थी
या सच में ही ,
इश्क़ भी एक सौदा है
दिल तो हार जाओ
पर दर्द तो होता है।

