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Sangeeta Ashok Kothari

Classics

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Sangeeta Ashok Kothari

Classics

सावन के झूलें

सावन के झूलें

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याद आ जाते दिन शादी से पहले वाले,

मैं,मेरी सखियाँ सावन में झूला झूलते,

तभी तो चिर यौवन में कदम रखें ही थे,

संजीदा व्यवहार व नैनों में संजो के सपने,


सखियों संग हँसी ठिठोली करते-करते,

यादों में याद बहुत आते वो पल,वो लम्हें,

सखियों का चिढ़ाना भी मन को लुभाते, 

वक़्त के साथ साथ सब पीछे छूटते गये।।


तब एक पारम्परिक रिवाज था गाँव में मेरे,

कि सावन में ब्याहता पीहर आ झूला झूलें,

एक रस्म जिसमें झूला झूलना शगुन मानते,


बेटियाँ रोज एकासन करते थी सावन मास में,

हाथों में चूड़ा,मेहंदी रचा लहंगा चुनरी पहनते,

और फिर मास के अंत में पतिदेव लेने आते थे।

      

अब वो झूलें हवाओं में झूलते ही रह गये,

अध कटी रस्सी से लटके सावन के झूलें,

जो शान से लगाये थे कभी मिट्टी के आँगन में,


मंदिर की घंटी और हँसी के कहकहे कहीं खो गये,

नई इमारतें बनने से यादों के आशियाने ढह गए, 

गाँव, वहाँ के लोग, वो परिवेश सब पीछे छूट गये।।


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