STORYMIRROR

Rajendra Prasad Patel

Abstract

4  

Rajendra Prasad Patel

Abstract

सार्थक जमाना

सार्थक जमाना

1 min
259

कौन कहता कि जमाना बेकार है

मौन सुन ले उर ताना बेकार‌ है।


वक्त अनुराग सजा बैठा आस ले,

प्रेम धुन साज सुखाना बेकार है।


लाख कर कोशिश साया प्यार के,

राह चल शेष फंसाना बेकार है।


आग तन में जल पाये दीदार का,

ध्यान रख राख उड़ाना बेकार है।


दीपक जला घर फैले जी रोशनी,

क्रोध पर चीर जलाना बेकार है।


मौज करना पलकों में पानी भरे,

लोभ लत चाल चलाना बेकार है।


शूल पथ मौन मिले ले लेना उसे,

फूल वस भूल दबाना बेकार है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract