STORYMIRROR

Madhu Gupta "अपराजिता"

Abstract Action

4  

Madhu Gupta "अपराजिता"

Abstract Action

"साम्राज्य"

"साम्राज्य"

1 min
363

है लालसा साम्राज्य की विकट बड़ी 

चढ़ जाए यदि सिर पर यह कभी 

उचित अनुचित तनिक ना सोचे 

पाप पुण्य ना जाने ये


नरसंहार मचा दे ये

लोगों को क्या से क्या बना दे ये

डरे नहीं ये हटे नहीं ये

कितनों का खून बहा दे ये

हाहाकार मचा दे ये


कितनों का करदे घर सूना ये

कितनो को अनाथ बना दे ये ll

 है लालसा साम्रज्य की विकट बड़ी 

चढ़ जाए यदि सिर पर यह सिर्फ कभी

थी भूख दुर्योधन को साम्राज्य की बड़ी 

रच डाली थी महाभारत तभी

सिकंदर ने साम्राज्य पाने को 


क्या-क्या नहीं खेल रचाया उसने

जाने कितने ऐसे नाम हुए

मिट गए और मिटा दिया कितनों को

इंसान नहीं रह पाए वो

खुद को अंदर तक मार दिया 

लालसा साम्राज्य की पाने को ll


है लालसा साम्राज्य की विकट बड़ी 

चढ़ जाये यदि सिर पर यह कभी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract