साइकिल की सवारी
साइकिल की सवारी
वो साइकिल की सवारी बड़ी
हसीन हुआ करती थी।
वो पल बड़ा खुशनसीब हुआ करती थी।
पापा जब साइकिल से आते थे।
रोज हमें और दीदी को घुमाते थे।
वो पल भी बहुत प्यारे थे
जब जन्मदिन पे साइकिल पापा लाए थे।
फिर चिंटू पिंटू संग साइकिल से हम घूमे थे।
वो पल बड़ी बेचैनी थी
जब स्वाति कॉलेज आई थी।
और फिर कान में हौले हौले
ना जाने क्या गुनगुनाई थी
मैं भी खूब इठलाया था
फिर साइकिल ले के भागा था।
वो साइकिल एक जरिया था,
मोहब्बत का पहिया था।
स्वाति से प्यार एक खूबसूरत तराना था ,
साइकिल से चैन बार बार
गिराना भी एक बहाना था।
वो भी क्या हसीन पल थे ,
जब हम स्वाति के संग साइकिल पे बैठे थे
सावन में साथ साथ साइकिल
से हम घूमे थे।
स्वाति की जुल्फें से भीनी भीनी
सुगंध मन को मेरे बहकायी थी
चुम्बन लेने के चक्कर में
उस दिन चोट हमें बहुत आई थी।
साइकिल शब्द का नाम लेते
हमें एक बात याद आ जाती है
बचपन का पहिया फिर से
एक बार घूम जाता है।
स्वाति के संग वो हसीन
साइकिल वाले दिन
पल भर में नजर आ जाता है।

