रिश्तों की कड़वी सच्चाई
रिश्तों की कड़वी सच्चाई
होती है रिश्तों की नाज़ुक डोर।
भागते सिरे इधर उधर हर ओर।
यही है रिश्तों की कड़वी सच्चाई।
जब जब बीच में गलतफ़हमी आई।
अगर रिश्तों को जोड़कर है रखना।
जुदाई का दर्द कभी नहीं है चखना।
बातें ज़्यादा न भी हों, तो कम रखो।
एक दूजे पर भरोसा तो क़ायम रखो।
