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सीमा शर्मा सृजिता

Tragedy

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सीमा शर्मा सृजिता

Tragedy

रिक्ता

रिक्ता

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बाहर से बिल्कुल हमारे जैसी है 

मगर भीतर से बिल्कुल रीति 

हां रिक्ता है वो 

जला दिये हैं सारे भाव 

उसी धधकती ज्वाला में 

जो हर रोज महसूस होती है 

पेट की ज्वाला 

या कहूं उस भाव के अलावा 

समस्त भाव उससे अछूते हैं 

वो समझती है खुद को 

खिलौना -भावशून्य खिलौना 

खेल सकता है जो चाहे 

जितना चाहे 

वो मानती है खुद को

चादर -मैली चादर 

जिसे ओढ़ते हैं चन्द 

नामी -गिरामी लोग 

बन्द कोठरी में 

बस बन्द कोठरी में 

वो परोसी जाती है 

कतरा - कतरा 

और खाई जाती है मजे से 

छुपते -छुपाते 

उन पांखडियों द्वारा 

जो जाने जाते हैं 

शाकाहारी -शुद्ध शाकाहारी 

स्त्री के शरीर के अलावा 

वो कुछ नहीं मानती स्वयं में 

स्त्री जैसा 

प्रेम, विवाह, घर, बच्चे ,पति

अमिट होता है उसकी 

हस्त रेखाओं से 

या कहूं मिटा दिया जाता है 

कभी किस्मत 

तो कभी किस्मत गढ़ने वाले 

जीते - जागते खुदाओं द्वारा 

और बना दिया जाता है 

रिक्ता 

एकदम रिक्ता 

दुर्भाग्य देखो 

महज मांस के लोथडे़ के अलावा 

कुछ नहीं होता उसमें 

कुछ भी नहीं ........

   


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