रह जायेंगी...
रह जायेंगी...
अधूरी-अनकही-अनसुनी बातें
दिल की दीवारों में दब कर रह जायेंगी...
आप सब ये सोचते रह जायेंगे...
कि वो ऐसा होता, तो कैसा होता...
मगर दिल में शिकायतें बेहिसाब दबी रह जायेंगी...
कुछ आप न कह पायेंगे
और कुछ हम न सुन पायेंगे...
यही दास्ताँ हैं दर्द-ए-दिल की बेइंतहाँ...
कि वक़्त का परचम जो लहराएगा,
तो दिल फूट-फूटकर रोयेगा...
मगर आँसू पोछने की ज़हमत
कोई उठा ही न पायेगा...!!!
मुलाक़ातें अधूरी...बातें अधूरी...
शुकायतें अनसुनी...यादें पुरानी...
यही है दुनिया जानी-अनजानी !!!
पल-पल का हिसाब कोई दे न पायेगा...
