"रेत को तन पे लपेटे"
"रेत को तन पे लपेटे"
को तन पे लपेटे
देर तक, औंधे मुँह किये लेटी रही
दर्द के सैलाब से,
दरिया सागर भरती रही
देर तक औंधे मुंह किये,
रेत पे लेटी रही.....
फिसल जाएंगे गम सभी,
रेत ही की तरह....
सो तपती हुई रेत को,
ऊंगलियों से मसलती रही
देर तक औंधे मुँह किये
मैं रेत पे लेटी रही.....
फफोले से पड़ गए
जलती रेत से मिरे
दर्द और भी पिघल रहा
रग-रग में बस रहा
मैं चुप रही ना कुछ कह सकी
ख़ामोशी में बहती रही
देर तक, औंधे मुँह किये,
रेत पर मैं लेटी रही.....
करवा जो साथ था,
दिल के बहुत समीप था
दूर और दूर मुझसे...
आहिस्ता-आहिस्ता होता गया,
मैं अकेली तन्हा वही रेत पर जलती रही,
रेत को तन पर लपेटे,
देर तक, औंधे मुंह किए लेटी रही...
वक्त भी रेत सा
हाथों से फिसलता रहा
मैं वही टुकड़ों में बटी
दर्द की छांव तले
रेत के आग़ोश में देर तक पड़ी रही
रेत को तन पर लपेटे
देर तक, औंधे मुँह किये लेटी रही...!!
