#राष्ट्रभाषा हिंदी का दर्द#
#राष्ट्रभाषा हिंदी का दर्द#
ओ हिन्दी! हिंदुस्तान की वाणी,
दर्द दिल में तेरा मां चुभता है।
आज की देख अनदेखी तेरी,
भूत का वैभव तेरा जब सूझता है।
तुतलाती सी आवाज को जिसने,
निज शब्द स्नेह से संवार दिया।
उस मातृ रूपा मृदु हिन्दी को ही,
आज, हमने न जाने क्यों नकार दिया?
हमारे लिए तूने तत्सम - तद्भव,
देशज - विदेशी शब्दों को स्वीकार किया।
तेरे ही बलबूते फिल्म जगत ने भी,
अरबों - खरबों का कारोबार किया।
तू ठगी गई ,तू छली गई तब,
सन उन्चास में ,राजभाषा ही स्वीकार किया।
मैकाले चला गया भारत छोड़कर,
फिर भी क्यों, राष्ट्रभाषा न तुझे स्वीकार किया ?
ये हिन्दी मानुष अंग्रेजी बने कब?
क्यों नित अंग्रेजी का ही प्रचार किया?
गर इतना ही लगाव है अंग्रेजी से तो,
क्यों न ,अंग्रेजी में ही, फिल्मी कारोबार किया?
कमाई को है मां तू लगाई,
यूं सौतेली का सा व्यवहार किया।
पढ़ते - लिखते अंग्रेजी में ही सब,
फिर क्यों हिन्दी में कारोबार किया?
भारत देश की ओ जन भाषा!
किसने तेरा उद्धार किया?
औंधे मुंह गिर जाता है वह इक दिन,
जिसने माता का प्रतिकार किया।
अपने ही घर में पराई हो गई,
भारत देश की मातृभाषा।
अपनों ने ही नकारा और धुधकारा
औरों से तो करनी ही क्या आशा?
