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Mamta Singh Devaa

Inspirational

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Mamta Singh Devaa

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प्यार की कलियुगी परिभाषा

प्यार की कलियुगी परिभाषा

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प्यार कभी भी सिर्फ प्यार नही होता है

थोड़ा प्यार और ज्यादा स्वार्थ होता है ,


सुबह गरम चाय की प्याली मिल जाये

बिस्तर पर ही खाने की थाली मिल जाये ,


फिर तो शब्दों की गठरियाँ खोली जायेगीं 

उनमें से चुन चुन कर तारीफें बोली जायेगीं ,


ढ़ेरों तारीफों के बाद अगर गलती हो जाये

ज़लील करने का एक मौका ना छोड़ा जाये ,


लोहे वाले रोबोट के सीने में तो दिल नही होता

इंसान वाले रोबोट में तो बाखूबी मौजूद होता ,


अब तो प्यार भी रोबोट के चिप में डाला जाता है

बटन दबाकर उसको प्यार करने को कहा जाता है ,


लोहे वाले की चिंता होती है खराब ना हो जाये

इंसान वाले का क्या है वो मुआ भाड़ में जाये ,


बिना हीलिंग ऑयलिगं के चलना भी कमाल है

ज़रा सा तबियत नासाज़ हो जाये तो बवाल है ,


ज़रूरतों की आपूर्ति करने वाला ही लाचार है

उसके बारे में सोचना तो एकदम बेकार है ,


इस थोड़े से प्यार में भी वफादारी होती है

ज्यादा स्वार्थ में तो बस दुनियादारी होती है ,


ये प्यार और स्वार्थ का जो जटिल व्यूह है

महाभारत से भी ज्यादा खतरनाक चक्रव्यूह है ,


इस चक्रव्यूह में किसी को मारा नही जाता

बस थोड़े से प्यार में ज्यादा स्वार्थ साधा जाता ,


हर रिश्ते में स्वार्थ ही अब तो सर्वोपरि है

प्यार कहाँ बचा है वो तो सिर्फ ऊपरी है ,


कहते हैं अपनों में स्वाभाविक प्यार होता है

वो त्रेता था वर्तमान को कलियुग कहा जाता है ,


हम इंसानों से अच्छे तो ये लोहे वाले रोबोट हैं

अपने प्रोग्राम के ज़रिए प्यार को करते सपोर्ट हैं ,


इस युग में प्यार की परिभाषा सच में बदल गई है

इतना स्वार्थ देख कर परिभाषा भी दहल गई है।


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