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मिली साहा

Romance

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मिली साहा

Romance

पुकार

पुकार

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जहां वो है वहां तक 

पांव की आहट नहीं जाती

मैं मुस्कुरा भी दूं तो क्या 

वहां तक मुस्कुराहट नहीं जाती।


इश्क की गलियों में छोड़कर अकेला 

न जाने कहां गुमनाम हो गया

मैं कितना भी पुकार लूं उसे 

वहां तक कोई पुकार नहीं जाती।


दिल के दरिया में उम्मीद की नांव 

कब से मझधार में फंसी है

साहिल तक ले जाए जो 

ऐसी कोई भी पतवार नहीं मिलती।


तुम चले क्या गए दूर 

कलियों ने भी खिलना कर दिया है बंद

जो देख लूं कहीं गुलाब भी 

न जाने क्यों उसकी खुशबू नहीं आती।


आता है सावन हर वर्ष 

मौसम में बहार बारिश की फुहार लेकर,

भीग भी जाऊं जो बारिश में 

तो ये बूंदें मन को नहीं भिगोती।

 

मंद बहती पवन जब छूती है तन को 

तो चुभती है कांटों सी

मायूसी की चादर ओढ़ा जाती ये पवन 

तेरा कोई संदेश नहीं लाती।


किस शहर किस गली में ढूंढूं तुम्हें 

किससे करूं फरियाद तुम्हें पाने की,

अब तो लगता है जैसे खुदा तक भी 

मेरी फरियाद नहीं पहुंचती।


दिल की दीवार पर देखकर तेरी तस्वीर

बस जीए जा रहे हैं हम

कहीं आ न जाओ तुम इसी उम्मीद में 

ये सांसें भी नहीं रुकती।


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