पतंग नुमा जिंदगी
पतंग नुमा जिंदगी
ज़िंदगी की पतंग उलझ गई है....
जाके तेरे छत पे फंस सी गई है.....
डोर दिल की, पतंग जैसी कट गई है....
जाके तेरे छत पे, मेरे पास आना भूल गई है।
दिखा था मुझको तेरी आंखों में मुहब्बत का काला जादू...
मखमली आवाज़ जो सुनी थी तेरी.... सुरमई गज़लों में सुबह भी सिंदूरी .....
तुम जैसी खूबसूरत रचना.....
परी कथाओं में सुनी थी....
जान मेरी, जीवन डोर उलझ गई है.....
तुम इसे तो सुलझाओ ज़रा सा .....
तुम्हारे नैनों के कजरे से...
सुबह में भी, शाम हो गई है....
पतंग मेरी कट गई है ......
डोर पे तुम इसके इश्क़ का मांझा तो चढ़ाओ.....
ठहर गया है दिल ....
अब फिर से इसे धड़कना तो सिखाओ....
तुम कोई तो मुहब्बत के नगमे सुनाओ....
या थोड़ी देर मुझे यहीं ठहर जाने दे...
डूब के इश्क़ में तेरे, मन की प्यास बुझा लेने दे।
उलझ - उलझ कर उलझन बढ़ी है...
मन जोगी हुआ है जी......
प्यार से राग तराने सुनाओे
या डूबती नैय्या को प्रेमघाट पहुंचाओ....
ये जो मन है तुम्हारा.....
क्या ये तुम्हारा है...
तुम जो मेरे नहीं तो....
फिर भी मैं तुम्हारा था तुम्हारा ही रहूंगा।
जाने क्या और कैसा हंसी सितम है.....
ये जानता भी है दिल......
मगर स्वीकारता नहीं...
तुम दिल की खुशियों में राज़ी....
मुहब्बत का सारा जज़्बात ए ज़िन्दगी तुमसे...
ज़िंदगी की पतंग तुम मेरी....
मैं मांझा चढ़ा इश्क़ का मजबूत सा धागा।
ज़िंदगी की पतंग उलझ गई है.....
तुम्हारे नैनों में खो सी गई है....
प्यार की मूरत तुम्हीं हो...
पूजा की फूल भी तुम्हीं हो...
तुम्हीं सांसों की डोरी....
तुम्हीं आंखों की सुकून हो.....
तुम्हीं सारा इरादा.....
तुम्हीं मुहब्बत का सारा वादा।
ज़िंदगी की पतंग उलझ गई है...
जाके तेरे छत पे फंस सी गई है...
डोर दिल की, पतंग जैसी कट गई है...
जाके तेरे छत पे मेरे पास आना भूल गई है।।
