STORYMIRROR

Mukesh Kumar Modi

Romance

4  

Mukesh Kumar Modi

Romance

प्रीतम की प्रतीक्षा

प्रीतम की प्रतीक्षा

1 min
62


मन का द्वार मैं देखूं हर पल प्रीतम कब आओगे

किया जो वादा मिलने का भूल तो नहीं जाओगे


शब्दों से मैं शान्त हुई मन किया संकल्पों से मौन

नजरें लगी द्वार पर आओ जाने वो घड़ी है कौन


स्वप्न सजे हैं जाने कितने तेरे मिलन की आस में

अवश्य होगा मिलन हमारा जियूँ इसी विश्वास में


विरहयुक्त मन की वीणा यदि सुन कहीं तुम पाते

देर ना करते प्रीतम इतनी उड़कर पास मेरे आते


निरन्तर चलती ये सांसे मेरी जाने कब रुक जाए

मेरा एक यही निवेदन कि मिलन तुमसे हो जाए


पलके बिछाए बैठी हूँ प्राणों के प्रीतम आ जाओ

मेरे कानों को अपने कदमों की पदचाप सुनाओ


जीवन मेरा नमक का ढ़ेला तुझमें ही घुल जाऊँ

तेरे प्यार में डूबकर मैं शहद सी मीठी बन जाऊँ

 

मेरी चेतना की रग रग में प्यारे प्रीतम समा जाना

उतर कभी ना पाए ऐसा संग का रंग लगा जाना।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance