प्रेम-पत्र
प्रेम-पत्र
वो साज कहाँ जो सरगम से,
भर दे उन्माद उमंगों का ।
है शब्द कहाँ जो दर्द बने,
इस प्रेम पत्र के छंदों का ।।
दिल को रोका सौ बार कहा,
क्यों बात कहे इन पत्रों से ।
आँखें रिमझिम बरसात बनीं,
बुन "प्रेम-पत्र" इन अधरों से ।।
सियाचिन की मादक मोहक,
ऐ ठंडी-ठंडी हवा बता ।
इस प्रेम-पत्र के माध्यम से,
क्या दर्द कहूँ, कुछ कहाँ पता?
सुन पीली सरसों बात मेरी,
कुछ रंग उधार मुझे दे दो ।
है रूठी प्रियतम दूर देश,
जीवन में उसके रंग भर दो ।।
झिलमिल तारे एक बात कहूँ?
बस यह संदेश उसे दे आ ।
वो उदास, तप्त है शोक व्यथित,
तू जाकर उसका मन भर आ ।।
इस बार अगर हम मिल पाए,
हर दर्द बयां कर जाऊँगा ।
जो प्यार छिपा मन मंदिर में,
प्रियतम तुमको बतला दूंगा ।।
बस एक बार ही जीवन में,
होता है सच्चा प्यार प्रिय ।
कहते हैं सब इस दुनिया में,
यह ईश्वर का वरदान प्रिय ।।

