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प्रभात मिश्र

Romance

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प्रभात मिश्र

Romance

प्रेम क्या होता है ?

प्रेम क्या होता है ?

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प्रेम क्या होता है 

यह नहीं जानता था मैं 


नेत्र भर देखने से तुझे

शांति पा जाता था मैं

घंटो की प्रतीक्षा का

फल पा जाता था मैं 

बेसिर पैर की सभी

बातें बतियाता था मैं 

फिर मुख्य वार्ता से 

दूर रह जाता था मैं 


प्रेम क्या होता है 

यह नहीं जानता था मैं 


भविष्य के परिणामों को

खूब जानता था मैं 

स्वप्नों के अवसानों को

पहचानता था मैं 

फिर भी तेरी हर हाँ में

सदैव हाँ मिलता था मैं

तेरी प्रसन्नता मे ही

प्रसन्न हो जाता था मैं


प्रेम क्या होता है

यह नहीं जानता था मैं 


चाहता था तुझपे कोई

आँच ना कभी आये 

यथार्थ के धरातल पर

पैर यूँ न मोच खाये 

तेरे बचपने को दृष्टि

किसी की न लग जाये

मित्रों से भी इसीलिए

हर बात छुपाता था मैं 


प्रेम क्या होता है

यह नहीं जानता था मैं 


चाहता तो था प्राप्ति 

परंतु सत्य जानता था मैं

तेरे विश्वास पर ही फिर भी

आस ठानता था मैं

कही अनकही तेरी 

हर बात जानता था मैं

फिर भी आत्मवंचना के

दुर्ग बाँधता था मैं 


प्रेम क्या होता है

यह नहीं जानता था मैं।



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