STORYMIRROR

Kavita Sharrma

Abstract

4  

Kavita Sharrma

Abstract

प्रेम के रुप अनेक

प्रेम के रुप अनेक

1 min
396

जितने तारे हैं नील गगन में

उतनी भावनाएं छुपी हैं मन में

कभी इक मंद पड़ जाती है

 कभी दूजी चमक जाती है


इन भावनाओं के पूंज में

छिपी है रोशनी जीवन की

प्रेम शायद उसे कहते हैं

जीवन में रिश्ते इससे महकते हैं


मां का वात्सल्य बच्चे पर अगाध

दोस्त की दोस्ती का प्यार ही है नाम

सजनी का प्रेम है बड़ा अटूट

बांध दे साजन को जन्मों में यूं


प्रेम का पराकाष्ठा का भक्ति है नाम

मीरा जिसकी दिवानी है वो है घनश्याम।

प्रेम के रूप अनेक प्रेम के अलग नाम

बिन प्रेम के चल न पाये ये संसार।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract