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Savita Gupta

Abstract

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Savita Gupta

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प्रेम के बीज

प्रेम के बीज

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अपलक तेरा राह निहारती हूँ

सीने में है टीस पर अरमान जगाती हूँ

मेरा क्या क़सूर हर बार पूछती हूँ

नियती ने रचा उस मेंहदी के रंग में रंगी हूँ


कोरी है कलत्रा

प्रेम बीज उगाओ तो ज़रा...


चाहत का दीया जलाए बैठी हूँ

घर का हर कोना सजाए बैठी हूँ

प्रार्थना की आरती में हो तुम

लोबान का महकता अरदास हो तुम


कोरी है कलत्रा

प्रेम राग गाओ तो ज़रा...


होंठों पर यादों के गीत के सरगम

हर लम्हे तेरे एहसास के हमदम

नैनों से नीर झरे जब बदरा बरसे

सजल आँखें न धीर धरे बस तरसे


कोरी है कलत्रा

प्रेम रस बरसाओ तो ज़रा...


ख़ुशबू बदन की ओढ़े विरहिणी सी

फिरती हूँ केश खोले आकर उलझ जाओ

इनमे,टाँक दो अधरों का शहद

ब्याहता हूँ तेरी ,त्याग क्यों दिया शरद

श्याम वर्ण सिर्फ यही दोष है शायद?


कोरी है कलत्रा

प्रेम बीज जगाओ तो ज़रा...


श्याम रंग के राम कृष्ण हैं शिव

पूजे तू नर नारी हर दिन

नज़र क्यों फेर लिया प्रिय

एकाकी तिरस्कृत हो गई निर्जीव


कोरी हैं भार्या

टूटा सम्मान लौटाओ तो ज़रा...


तिल तिल घूंट रही हूँ शंभु

बीते वक्त का हिसाब दो प्रभु

मूक पत्थरों में बसे हो रघु

पिय प्रेम बीज उगा दो स्वयंभू


कोरी हैं भार्या

पाषाण में अंकुर खिलाओ तो ज़रा।...


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