STORYMIRROR

संदीप सिंधवाल

Romance

3  

संदीप सिंधवाल

Romance

प्रेम बरखा

प्रेम बरखा

1 min
331

प्रेम बरसा चहुं ओर, बिखरि छटा घनघोर।

आशा अंकुर फूटती, मन में नाचे मोर।।

मन में नाचे मोर,  मृदु गूंजे कोयल कूक।

उमड़े मेघ अम्बर, मिटती है मन की भूख।।

झूमता 'सिंधवाल', पाकर ऐसी नव भौंर।

प्रेम से जग धान्य,  टूटा हिय देता जोड़।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance