पंख का मोल
पंख का मोल
देखो, कैसे दाना चुगे रे,
जमीन का है या फेका हुआ, वो ना सोचे रे,
जिसने भी प्रेम भाव से रखा उसी को चुने रे,
देखो कैसे इत्मीनान से दाना चुगे रे...
कैसा होता होगा इनका जहान,
जितनी खुली और मनमोहक इनकी उड़ान दिखती,
क्या उनकी दुनिया की हकीकत भी वैसी होगी,
या अप्रत्यक्ष रुकावट से पस्त मंजिल होगी...
क्या वो अड़चन हमने ही तो नहीं डाले,
देखो नीले गगन को,
कैसे काले तार से लिपटे है,
क्या वो इन्हें न सताते होंगे?
वो उड़ती विमान जो हमारा सहूलियत बन बैठा,
क्या उसे आता देख इनका नीर न बहता होगा?
हम खेल-खेल में, कभी त्योहार के नाम पर,
उस नभ को कंदील से सजाते है,
कभी गुब्बारों पर चिट्टी लिख, उपरवाले को भेज आते है,
हम भी बावरे ख़ुशी की आड़ में क्या-क्या नाटक रचाते है,
और मकर संक्रांति का माह तो पूछो ही ना...
क्या यह सब इनकी उड़ान रोकते होंगे,
या जीवन की डोर तोड़ते होंगे?
मैंने देखा है, इनको लहू-लुहान,
काँटेदार धागे से लिपट कर बिलकते हुए,
फांसी से भी बुरी हालत से गुजरते हुए,
मैंने देखा है इन्हे मौत से भी बुरी मौत मरते हुए...
क्या इनके हौसले का दम न घुटता ता होगा?
क्या इनका परिवार भी चूर-चूर न होता होगा?
क्या मौत का तांडव इनके कैद की वजह न बनता होगा?
आज वो फिर आया था मेरे आंगन,
पंखों में मुस्कान भर कर,
अपनी उड़ान में उम्मीद संजोकर,
लेकिन आंखो में अनगिनत सवाल लेकर।
कुछ देर चहका, दाना-पानी का लुत्फ़ लिया,
और उड़ चला मनमौजी गगन की और,
क्या वो सच में इतने बेफिक्र होते होंगे?
वो फिर अगली सुबह दस्तक दिया,
इस बार बारजा में बने मंदिर को निहारता रहा,
जैसे उस मूरत से मन की विपदा कह रहा हो,
क्या वो भी भगवान में मानता होगा?
क्या इनमें भी तुम्हारी-मेरी तरह कुछ नास्तिक होंगे?
कैसा होगा इनका जहान,
सितारों से क्या वो रोज़ मिलते होंगे?
क्या वो भी शशि को देख प्यार के नग़्मे लिखते होंगे?
या उसे दर्द भरी ग़ज़ल सुनाते होंगे?
हमें तो मां यह कह कर खिलाती थी,
“की खाले बेटा वरना कबूतर खाना ले जाएगा”,
क्या उस पंछी की मां भी उसे ऐसे ही खिलाती होगी,
“खा ले कबू वरना निर्दय इंसान चीन ले जाएगा”।
बिना मैप या कंपास के भी कैसे सही राह चुनते हैं,
हम तो सलाह ले-ले कर अगली गली भी ना पहुंच पाते हैं,
कैसे सह परिवार वे गगन के गोते लगाते हैं,
हमारा तो अपना से नाता खुद भी ना समझ पाते है...
देखो उस पंछी को कैसे मदमस्त लहराए रे,
आशा-निराशा से परे प्रतिदिन गुनगुनाए रे,
रुकावट है जानकर भी पंख फैलाए रे,
देखो उस पंछी को क्या खूब इठलाए रे...
