पीड़ा
पीड़ा
चुप रह, बात ना कर तू आली !
कैसी होली, क्या रंगरेली,
होली -जो होनी थी, होली-
चला गया बगिया का माली,
मंदिर सूनाकुटिया खाली !
चुप रह० .....
तरह-तरह के रंग सब लाए,
तन को बहुत भिगोने आए,
मन को मगर डुबोने वाला-
कौन उँडेलेगा रंग आली।
चुप रह...
लेकर नव गुलाल सब आए,
भावों के सपने दिखलाए,
मन की ज्वाला शांत ना होकर-
और दहकती जाती आली !
चुप रह...
सब कुछ है, अपनापन खोया,
चुपके -चुपके "कोई" रोया,
कहां गई वह मधुरिम मूरत-
करके उर की धड़कन भारी।
चुप रह....
रोली रोयी, चंदन रोया,
उपवन का हर कोना रोया,
व्यथित हृदय का पंछी रोया-
सबका नीड़ कहां है ?
आली ! चुप रह.....
आँसू ही जीवन की गति है,
आँसू ही इसका अथ -इति है,
आँसू प्रेम -प्रीति का स्वर है-
सुन ले और सुना दे आली !
चुप रह बात ना कर तू आली।
