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Neeraj pal

Abstract

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Neeraj pal

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पीड़ा

पीड़ा

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चुप रह, बात ना कर तू आली !

कैसी होली, क्या रंगरेली,

होली -जो होनी थी, होली-

चला गया बगिया का माली,

मंदिर सूनाकुटिया खाली !

चुप रह० .....


तरह-तरह के रंग सब लाए,

तन को बहुत भिगोने आए,

मन को मगर डुबोने वाला-

कौन उँडेलेगा रंग आली।

चुप रह...


लेकर नव गुलाल सब आए,

भावों के सपने दिखलाए,

मन की ज्वाला शांत ना होकर-

और दहकती जाती आली !

चुप रह...


सब कुछ है, अपनापन खोया,

चुपके -चुपके "कोई" रोया,

कहां गई वह मधुरिम मूरत-

करके उर की धड़कन भारी।

चुप रह....


रोली रोयी, चंदन रोया,

उपवन का हर कोना रोया,

व्यथित हृदय का पंछी रोया-

सबका नीड़ कहां है ?

आली ! चुप रह.....


आँसू ही जीवन की गति है,

आँसू ही इसका अथ -इति है,

आँसू प्रेम -प्रीति का स्वर है-

सुन ले और सुना दे आली !

चुप रह बात ना कर तू आली।


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