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Rishabh Tomar

Tragedy Inspirational Others

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Rishabh Tomar

Tragedy Inspirational Others

पीड़ा में प्रकृति का मन

पीड़ा में प्रकृति का मन

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छिन्न भिन्न किया प्रकृति को,

भींग गये है उसके नयन।

तभी कोरोना तभी अधियाँ,

आफ़त आई है ये गहन।


मिली अमानत में हमको थी,

सतरंगी प्यारी प्यारी।

छेड़खानी करके हम सबने,

रंगों का कर दिया दमन।


स्वर्ग से सुंदर धरती थी ये,

कल्पवृक्ष हर जंगल थे।

काट काट के जंगल हमने,

सुंदरता का किया हवन।


जंगल काटे, सागर पाटे,

हिंसा और रक्तपात किया।

देख रक्त की सरिता भू पे,

पीड़ा में प्रकृति का जहन।


झूठी तकनीकी के नाम पे,

भौतिकता की ख़्वाहिश में।

दूषित धरती, दूषित वायू ,

दूषित कर डाला है गगन।


ईश्वर का साक्षात स्वरूप है,

हरी भरी कुदरत सारी।

अपनी संतानों का मरना,

कैसे कर ले भला सहन।


जल वायू आकाश अग्नि,

धरती सबके सब दूषित।

धुआँ धुआँ हर ओर बसा है,

व्यथित बहुत प्रकृति का मन।


संभल गये तो ठीक है वरना,

मिटेगी मानव की बस्ती।

ये आंधी तूफा बस संदेशे है,

संकट तो अब आयेंगे गहन।


प्रकृति के न परे ऋषभ है,

मानव की कोई हस्ती।

पर्यावरण बचाओ मिलकर,

लगाओ अपना तन मन धन।



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