राहुल द्विवेदी 'स्मित'
Action Inspirational
दुश्मनों की बस्तियों में जलजला आ जायेगा।
जब वतन की आबरू का मस'अला आ जायेगा।
तू हमारी छोड़, खुद की पैरवी मजबूत कर..
जब भी हम चाहेंगे उस पल, फैसला आ जायेगा।।
बदल गये हैं ख...
अगर चाहते हो ...
गीतिका छंद छं...
नेत्र यदि आपक...
आस लगाए बैठी ...
आदमी की अक्ल ...
एक मौसम शायरा...
एक ऐसा भी जमा...
दौर सतयुग का ...
साँसों का बुन...
हाँ ! मजदूर हैं हम ।साहब ! दर- दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं हम। हाँ ! मजदूर हैं हम ।साहब ! दर- दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं हम।
तुम्हें ये सब बदलना है अपने जैसे लोगों के साथ मिलकर सबके लिए। तुम्हें ये सब बदलना है अपने जैसे लोगों के साथ मिलकर सबके लिए।
अभी-अभी तो ख्वाहिशों ने की थी उड़ान की शुरुआत अभी-अभी तो ख्वाहिशों ने की थी उड़ान की शुरुआत
ये एक खूबसूरत दुनिया है, जिसे ईश्वर और खुदा ने मिलकर इंसानों के लिए बनाया है ये एक खूबसूरत दुनिया है, जिसे ईश्वर और खुदा ने मिलकर इंसानों के लिए बनाया है
मुझे संघर्ष एवं संभावनाओं की असीमितता पर मुझे संघर्ष एवं संभावनाओं की असीमितता पर
जिंदगी में गांठ तू बांध लेना कि हिम्मत हौसला है तेरा गहना। जिंदगी में गांठ तू बांध लेना कि हिम्मत हौसला है तेरा गहना।
दर्द अगर आते हैं, दर्द के सुर में गाते है, हर काल में यूं तो, निज शान बचाते हैं। दर्द अगर आते हैं, दर्द के सुर में गाते है, हर काल में यूं तो, निज शान बचाते ह...
दाने दाने को मर रहा आपका परिवार है। ये कैसे कश लगाते हो? दाने दाने को मर रहा आपका परिवार है। ये कैसे कश लगाते हो?
जिसने नाम ना जपा, उसे है अफसोस, अंतिम सत्य रूप में, ले लेता आगोश। जिसने नाम ना जपा, उसे है अफसोस, अंतिम सत्य रूप में, ले लेता आगोश।
सब मिलकर भरते रहे उसमें पूरा जोश उसको अपने कर्म का किंतु तनिक रहा न होश सब मिलकर भरते रहे उसमें पूरा जोश उसको अपने कर्म का किंतु तनिक रहा न होश
पहचान मुझे तुम क्या दोगे मैं ख़ुद अपनी पहचान हूँ, पहचान मुझे तुम क्या दोगे मैं ख़ुद अपनी पहचान हूँ,
कौन कहता है कि गुलशन की जमीं उर्वर नहीं, कौन कहता है कि मेरा ये वतन कमजोर है। कौन कहता है कि गुलशन की जमीं उर्वर नहीं, कौन कहता है कि मेरा ये वतन कमजोर है।
मजहब से उनका काम नहीं, बस झूठी शान का तर्ज़ है ये मजहब से उनका काम नहीं, बस झूठी शान का तर्ज़ है ये
यह कविता शहीदो को सलामी दे रही है। यह कविता शहीदो को सलामी दे रही है।
छोड़ दे कान्हा बस एक बार कैसे छोड़ दूँ तुझे मैं कंस मामा छोड़ दे कान्हा बस एक बार कैसे छोड़ दूँ तुझे मैं कंस मामा
अब कृपा नहीं अधिकार चाहिये, मेरे वजूद पर ना उपकार चाहिये, अब कृपा नहीं अधिकार चाहिये, मेरे वजूद पर ना उपकार चाहिये,
पीपल का हूँ वृक्ष अभागा सूखे नयनन कृश है काया। पीपल का हूँ वृक्ष अभागा सूखे नयनन कृश है काया।
अटल विचार है व्यवहार है जेठ की भरी दोपहरी के बिहारी प्रज्वलित मशाल है। अटल विचार है व्यवहार है जेठ की भरी दोपहरी के बिहारी प्रज्वलित मशाल है।
तीन कपड़ों में तुम्हें ब्याह कर लाए थे अपने होनहार बेटे के लिए तीन कपड़ों में तुम्हें ब्याह कर लाए थे अपने होनहार बेटे के लिए
हम सब कविता के एक एक शब्द को आत्मसात कर रहे थे आनंद ले रहे थे। हम सब कविता के एक एक शब्द को आत्मसात कर रहे थे आनंद ले रहे थे।