STORYMIRROR

Dipanshu Asri

Abstract

3  

Dipanshu Asri

Abstract

फैज़ान

फैज़ान

1 min
345

उसकी सोच में अँधेरा था 

मेरी बातों में सवेरा था


वो आसमान का मिज़ाज़ था 

मुझे ज़मीन का एहसास था


वो बुज़दिली में जीता था 

मैं घूँट कड़वा पीता था


वो बिना बात का मज़ाक था 

मैं बेशुमार प्यार था


वो सूना सा बाज़ार था 

मैं अल्लाह की मज़ार था


वो खो गया तो खोने दे 

मैं उठ गया तो जीने दे


वो झूठा जालसाज़ था 

मैं सच्ची एक आवाज़ था


वो कायर था, नापाक़ था 

मैं शेरदिल साफ़ था


वो खून गंदा बेईमान था 

मैं वीर अमर फैज़ान था।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract