STORYMIRROR

Sarita Saini

Tragedy

2  

Sarita Saini

Tragedy

पैग़ाम-ए-मोहब्बत

पैग़ाम-ए-मोहब्बत

1 min
142

ज़िन्दगी भी क्या खूब रंग दिखाती है ,

चाहत हो जिसकी उसी से दूर ले जाती है।

एक समारोह में हमारी मुलाक़ात हुई थी ,

कभी न भूल पाऊँ जिसे ,कुछ ऐसी ही बात हुई थी।

मोहब्बत का उनकी तरफ से पैग़ाम आया था

शायद बरबादी का पूरा सामान आया था।

इस कदर हम आज बरबाद हो चुके हैं ,

अपनी सारी खुशियों को भी खो चुके हैं,

पर समाये हैं दिल में वो आज भी याद बनकर

मेरी अधूरी मोहब्बत का एहसास बनकर।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy