पांच इंद्रियों पर आधारित कविता
पांच इंद्रियों पर आधारित कविता
गिर रहा इंसानियत का स्तर, देख ईश्वर भी हो गए मौन,
आंखों पर बंधी नफ़रत की पट्टी, प्यार समझता भी कौन,
जब इंसान की नजरों में ही इंसान की कोई कीमत नहीं।।
लड़ते हैं धर्म के नाम पर खुद को कहते हैं धर्म के ठेकेदार,
नौजवानों के हाथों में वे पकड़ा रहे हैं नफ़रत का हथियार।।
दौलत के बाज़ार में यहां सस्ते भाव बिक रही इंसानियत,
दौलत का दंभ दिखाकर पूछ रहे बता क्या है तेरी कीमत।।
सच्चाई और मानवता तो ना जाने किस गुफ़ा में दफ़न हैं,
देखना तो दूर की बात है आवाज़ तक सुनाई नहीं देती है।।
कानों में सुनाई देता है बस नफ़रत, घृणा और झूठ का शोर,
इंसान तेरी इंसानियत को क्या हुआ तू जा रहा किस ओर।।
लोभ, अहंकार के घोर अंधकार में फंसता जा रहा है इंसान,
कटु वाणी बोल जिव्हा करता मलीन, बनता जा रहा हैवान।।
गरीबों का करते दमन और अपनी नाक ऊंची करके चलते हैं,
मिथ्याभिमान में होकर चूर खुद को भगवान समझने लगते हैं।।
मान-सम्मान की क्या बात करें, पग-पग पर सम्मान हनन होता है,
कौन राम है यहां किसके अंदर बैठा रावण कहां पता चलता है।।
काश! कोई ऐसा आईना होता, चेहरे के भीतर छुपा रावण दिख जाता,
फिर शायद किसी नारी को कभी डर-डर कर नहीं चलना पड़ता।।
जाने कहां कहां किस कोने में इंसान की खाल पहने नाग बैठे हैं,
इंसानियत, मानवता को मारकर बस डसने का मौका ढूंढते हैं।।
नफ़रत एक ऐसा ज़हर है जिससे इंसानियत स्वयं मर जाती है,
इस ज़हर का स्पर्श मात्र ही इंसान को बरबादी की खाई में धकेल देती है।।
इतनी बुराइयां भरी हैं समाज में, लोग भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाते हैं,
समाज को सुधारने से पहले स्वयं के अंदर सुधार क्यों नहीं करते हैं।।
छोटी सी पहल अगर करें हर कोई इंसान, बूंद बूंद से घड़ा भर जाएगा,
इंसान समझ सकेगा इंसानियत को, शायद समाज थोड़ा सुधर जाएगा।।
