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Rashmi Sthapak

Tragedy

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Rashmi Sthapak

Tragedy

नवगीत

नवगीत

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खाँस रहे हैं डिब्बे घर में

आटे के सब खाली


फल सब्जी की खूब चलाई

दलिया हो गई दूर

दूध दही नित खाने वाले

छाँछ से भी मजबूर

साहब घर नित जलते दीपक

नित होती दीवाली


बैठ गई घर कंगाली अब

जैसे गम की रातें

नेताजी भी गली से निकले

करके ढुल-मुल बातें 

नन्हें बच्चे भी अब करते 

बातें राशन वाली


गेहूं ज्वार बाजरा सब पर

गया है पाला मार

बाबूजी को फसल देखकर

भारी चढ़ा बुखार

सुखिया ने भी खाट पकड़ ली

बाहर कोने वाली


देख देख कर घर की हालत

कजली रही उदास

गौना कैसे हो साहब जी

दूर बड़ा मधुमास

सावन में भी रूठ गई है

जाने क्यों हरियाली।


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