STORYMIRROR

Manu Sweta

Tragedy

4  

Manu Sweta

Tragedy

नन्ही कली

नन्ही कली

1 min
508

नन्ही सी कली थी

मुझको क्यूँ डाली से तोड़ दिया

खिलने का मन था मेरा

क्यों मुझको तोड़ दिया

पापा मैं तो बेटी थी तुम्हारी

क्यो मुझको ऐसे छोड़ दिया

मुझको भी तो झुलाया होता

अपनी बाहों के हार में

मुझको भी तो आने देते

इस सुंदर संसार मे

मैं भी पढ़कर आगे बढ़कर

नाम रोशन कर जाती

आखिर क्या कसूर था मेरा

जो मुझको गर्भ में मार दिया



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy