नज़्म
नज़्म
कुछ लम्हों का आना तुम्हारा खलता है,
दिन भर तुम्हारा खयाल साथ चलता है।
मत जाओ यूँ हाथ छुड़ाकर रुक जाओ,
दूरी के खौफ़ से नाजुक दिल धड़कता है।
रात में नैंना बरबस तेरी याद में जगते रहे,
मौसम यादों का कहाँ टाले से टलता है।
इश्क की आग ये कैसी उठी तन-मन में,
मन आँगन में प्यार का बादल बरसता है।
हर आहट पर चौंक कर देखूँ घबराकर,
जब तू जाने को कदम बाहर रखता है।
आसमान तू मन का ज़मीन ख़्यालों की,
बिन तुम्हारे रूह का टुकड़ा तड़पता है।
कहो करूँ क्या जतन तुम्हारी ख़िदमत में,
आगोश में छुपकर तेरे तन पिघलता है।

