Ajay Prasad
Drama
जैसी नियत
वैसी वरकत।
छोड़ नफ़रत
कर मुहब्बत।
दिल लगा कर
पाले जन्नत।
धर्म, मज़हब
बस है फितरत।
आओ हम तुम
जोड़े रगवत।
मिल के रहना
अपनी चाहत।
हम हैं जिंदा
उसकी रहमत।
ज़िंदगी क्या
रब की नेमत।
फ़िर अजय तू
कर ले उल्फत।
बहुत है
कविता पेट नही...
तू बता
मानो
बौना कर देंगे
ज़िंदगी
जान जाओगे
बिन फेरे हम त...
ओढ़ ली है कफ़न
नियत
हौसलों के फूल कहीं सूख न जाये खारे आँसू की न बरसात कीजिये हौसलों के फूल कहीं सूख न जाये खारे आँसू की न बरसात कीजिये
फ़िर क्यों सब कहते हैं कि.. तुम नहीं रहे अब...! फ़िर क्यों सब कहते हैं कि.. तुम नहीं रहे अब...!
मुझे अब तू रहने दे महकता ही क्यों खिज़ा का मौसम तू ले आई जिंसदी। मुझे अब तू रहने दे महकता ही क्यों खिज़ा का मौसम तू ले आई जिंसदी।
सुना है 6 गज में लिपटी कभी बेहद सुन्दर लगती थी। सुना है 6 गज में लिपटी कभी बेहद सुन्दर लगती थी।
एक वो जो अनमोल मणि देता है और एक वो जो ज़हर देता है। एक वो जो अनमोल मणि देता है और एक वो जो ज़हर देता है।
आज वर्तमान में जिम्मेदारी हम भी बखूबी निभा रहे भाई -बहन से परे, बच्चों के झगड़े सुलझा रहे। ये प... आज वर्तमान में जिम्मेदारी हम भी बखूबी निभा रहे भाई -बहन से परे, बच्चों के झगड़...
चली जा तू भी उसकी तरह मुड़कर जिसने देखा नहीं है चली जा तू भी उसकी तरह मुड़कर जिसने देखा नहीं है
धूप गर्मी या हो बरसात झट से आंचल सर पर तन जाए धूप गर्मी या हो बरसात झट से आंचल सर पर तन जाए
और उस अनुभूति से मेरी गिरती धूमिल होती मनोदशा को नई दिशा मिल गई। और उस अनुभूति से मेरी गिरती धूमिल होती मनोदशा को नई दिशा मिल गई।
जो समझ ले इसको वो अपनो से दूर नहीं होते हैं ।। जो समझ ले इसको वो अपनो से दूर नहीं होते हैं ।।
जो कभी शुरू ही नहीं हुई उस कहानी की बात क्या लिखूं जो कभी शुरू ही नहीं हुई उस कहानी की बात क्या लिखूं
अब खुद पत्थर सी ढल गई हूं मैं अब लगता है मुझको तेरी परछाई बन गई हूं मैं। अब खुद पत्थर सी ढल गई हूं मैं अब लगता है मुझको तेरी परछाई बन गई हूं मैं।
इस रंगीन दुनिया में क्यों रोजगार या मज़दूरों के पलायन वाली स्याह ख़बरें हम देखें? इस रंगीन दुनिया में क्यों रोजगार या मज़दूरों के पलायन वाली स्याह ख़बरें हम देखें?
इसका जवाब में तुम सबसे पूछता हूं अपने ख्वाबों के बंद ताबूतों में ढूंढता हूं इसका जवाब में तुम सबसे पूछता हूं अपने ख्वाबों के बंद ताबूतों में ढूंढता हूं
दर्द दूसरों का सुन-सुन कर थक चूंकि हूँ अपने दर्द सरे-आम करना चाहती हूँ दर्द दूसरों का सुन-सुन कर थक चूंकि हूँ अपने दर्द सरे-आम करना चाहती हूँ
सतरंगी रंगों से अपने तू आकर रंगना ख़ुशहाल ज़िंदगी हम देखें तेरा सपना। सतरंगी रंगों से अपने तू आकर रंगना ख़ुशहाल ज़िंदगी हम देखें तेरा सपना।
उसने सब कुछ बलिदान किया मन त्याग दिया तन त्याग दिया उसने सब कुछ बलिदान किया मन त्याग दिया तन त्याग दिया
रिश्तों में जो गांठ आए उससे पहले रिश्तों को संभालो रिश्तों में जो गांठ आए उससे पहले रिश्तों को संभालो
हाँ, माना तब गुस्सा करती थी लेकिन आज मैं उसे मिस करती हूँ हाँ, माना तब गुस्सा करती थी लेकिन आज मैं उसे मिस करती हूँ
न कुछ कह पाते ना कभी बता पाते चाहते भी तो आखिर किसे कहते हैं न कुछ कह पाते ना कभी बता पाते चाहते भी तो आखिर किसे कहते हैं