STORYMIRROR

Ajay Prasad

Abstract

4  

Ajay Prasad

Abstract

बहुत है

बहुत है

1 min
364

दुश्मनों को जो पसंद बहुत है 

अपने यहाँ जयचन्द बहुत है।


जो है अंधा, बहरा और गूँगा 

आवाज़ उसकी बुलंद बहुत है।


जिसने सीखा है सच छिपाना 

समझ लो के हुनरमंद बहुत है।


हर मौके का फायदा है उठाता 

यानी वो ज़रूरत मंद बहुत है।


माज़ी, हाल, मुस्तकबिल खंगाले 

देखिए आज करमचंद बहुत है।


छोड़ दिया अपने हाल पर हमें 

मगर वैसे वो फिक्रमंद बहुत है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract