निराश
निराश
कर बारंबार निराश मुझे
दे असफलता का ग्रास मुझे
हो मुदित मंद मुस्काता हैं
प्रारब्ध जीतता जाता हैं।।
संचित कर्मो का मान देख
विधि का उलट विधान देख
हूँ चकित थकित भरमाया सा
अंतस में कुछ अकुलाया सा।।
धीरज समेटने के प्रयत्न
आशा रखने के नव यत्न
गिर गिर कर फिर उठ जाता हूँ
मैं फिर फिर शक्ति लगाता हूँ।।
चखने को स्वाद सफलता का
हैं स्थान नही दुर्बलता का
शक्ति सहयोग जुटाता हूँ
मै नव उद्योग लगाता हूँ।।
कर बारंबार निराश मुझे
नही असफलता का त्रास मुझे
ना भय हैं ना संत्रास मुझे
स्व पर इतना विश्वास मुझे।।
रण ना यह साधारण कोई
हठ ठान भिड़ा विधि से कोई
किञ्चित ना स्कंध झुकाता
बस कर्मों की जय गाता है।।
हैं बाधाओं से कष्ट जिसे
ना शीर्ष कभी उसने चूमे
जो दुर्गम पथ पर गाता है
बस वह इतिहास बनाता हैं।।
जो स्वर्ण न तापा जाता हैं
वह कभी न शोभा पाता हैं
जिसने सीने पर वार सहे
वह पत्थर पूजा जाता हैं।।
कर बारंबार निराश मुझे
ना असफलता का त्रास मुझे।।
