मुर्दा शब्दों का कवि
मुर्दा शब्दों का कवि
चिंतन
जब ढल जाता है शब्दों में
बन जाता है कविता
और लिखने वाला कवि।
वही चिंतन
जब ढल जाता है कर्मों में
हो जाता है जीवंत
और व्यक्ति वैज्ञानिक।
सच है --
जीवंत चिंतन ही पूजे जाते हैं।
ओ! भूरी घास के कवि!
तुम बदलते हो चिंतन को सिर्फ शमशान की राख में।
मुर्दा राख...
और सोचते हो कि कोई तुम्हें भी पूजे!
बहरहाल, वो बात और है कि
कितने ही अपूर्ण
यह शमशान की राख शरीर पे लगा
बन जाते हैं पूर्ण शिव।
पूर्ण सत्य।
पूजे जाने वाले।
