STORYMIRROR

Paramjeet Singh

Tragedy

3  

Paramjeet Singh

Tragedy

मुझे मत मारो

मुझे मत मारो

1 min
378

सपने देख रहा था मैं

आसमां को छूने के

हरा भरा मैं आनंद विभोर

बढ़ रहा था अंबर की ओर

सारे लोग खुश बहुत थे

कभी छांव से तो कभी

फल खाकर

रास्ता भी बहुत रोका

कभी आंधी ने कभी

तूफ़ानों ने


जाने फिर वो कौन आया

आरी अपने साथ लाया

काटा मुझे मैं दुःखी हुआ

बहुत रोया जब निकली जान

मेरे जीवन का अंत किया

क्या देखा उसने नफा नुकसान


इतने दर्द सहे हैं मैंने

इतना कहर ढाया क्यों

इमारत को बनाना है तो

लोहे का झूला झूलो तुम

विष पीकर अमृत देता हूं

मुझ को मत भूलो तुम।।

  


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy