मुझे मत मारो
मुझे मत मारो
सपने देख रहा था मैं
आसमां को छूने के
हरा भरा मैं आनंद विभोर
बढ़ रहा था अंबर की ओर
सारे लोग खुश बहुत थे
कभी छांव से तो कभी
फल खाकर
रास्ता भी बहुत रोका
कभी आंधी ने कभी
तूफ़ानों ने
जाने फिर वो कौन आया
आरी अपने साथ लाया
काटा मुझे मैं दुःखी हुआ
बहुत रोया जब निकली जान
मेरे जीवन का अंत किया
क्या देखा उसने नफा नुकसान
इतने दर्द सहे हैं मैंने
इतना कहर ढाया क्यों
इमारत को बनाना है तो
लोहे का झूला झूलो तुम
विष पीकर अमृत देता हूं
मुझ को मत भूलो तुम।।
