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Paramjeet Singh

Abstract

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Paramjeet Singh

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अपनी कहां हूं मैं

अपनी कहां हूं मैं

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अपना सब कुछ छोड़ा मैंने

न कुछ नहीं सोचा

घर बाहर कभी

देखा इधर कभी देखा उधर


मां छोड़ी और बाप भी

बहन और भाई

गालियां सही सारी

सहर्ष स्वीकार किया मैंने


फिर गयी नए सफर पे

सोचो तुम मेरा स्मर्पण

भटकी सबकी सेवा में


नई कोशिश

कुछ करने की

सबको खुश करने की यह लड़ाई

आज भी मैं रही पराई।


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