कोई और ही मालिक है
कोई और ही मालिक है
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करता है मन इधर जाएं
या कभी उधर जाएं
पर लगता है बंधे है
धागे हाथों में
और पैरों में भी
मन और जिस्म में
हाथ हिलता नहीं
पर कोई हिला रहा है
पैर चलते नहीं
पर कोई चला रहा है
पलकें झपकती नहीं
पर कोई झपका रहा है
सांसें चलती नहीं
पर कोई चला रहा है
नाम चमकता नहीं
पर कोई चमका रहा है
इतने लोगों को चला रहा
वो गुमनाम ही इक है
अपना तो बस नाम चला है
कोई और ही मालिक है।।
