मुझे अफसोस है
मुझे अफसोस है
अब ना जवानी ना जोश है,
राक्षसों के प्रति नहीं रोष है,
सच कहना खुद में दोष है,
देख देख बड़ा अफसोस है।
देशभक्त अनेकों मिलते थे,
अब ना वो नेताजी बोस है,
देशद्रोही जगत में अब बढ़े,
इसका अधिक अफसोस है।
अब नहीं रहे देश में बच्चे,
मात, पिता, गुरु से डरते है,
दर्द दे रहे दिन रात अब तो,
इस पर अफसोस करते है।
चरित्रवान मिलते थे बहुत,
अब मिलता चरित्र दोष है,
अत्याचार बढ़ा गली गली,
मुझे इस पर अफसोस है।
मेहनत एक नारा होता था,
अब मेहनत ही एक दोष है,
निठल्ले मिले हर गली गली,
मुझको इस पर अफसोस है।
मुफ्तखोर जगत में बढ़ गये,
बढ़ता ही जाये यही दोष है,
सुर बदल जाते हैं पलभर में,
इसका तो मुझे अफसोस है।
अत्याचार बढ़े महिला पर,
समाज आज भी खामोश है,
सदियां बीती कष्ट सहती है,
इसका मुझको अफसोस है।
पुस्तकों से रूठ रहे लोग,
बढ़ता ही जा रहा ये रोग,
खत्म पहले वाला जोश है,
इसका मुझे अफसोस है।
बुजुर्ग सहते जा रहे पीड़ा,
कौन उठाये जन का बीड़ा,
हर जन में मिलता रोष है,
इस बात का अफसोस है।
पाप कर्म बढ़ रहे रोजाना,
परहित से मुख ही छुपाना,
पाप का भरा जग कोश है,
इसका मुझको अफसोस है।
लोगों के विचार बदल रहे,
यह किसी का नहीं दोष है,
समाज भी बदल रहा अब,
इसका मुझको अफसोस है।।
