मृत्यु को मेरी स्वर दो
मृत्यु को मेरी स्वर दो
श्यामल मेघों से ढंके
ऊंचे पर्वत शिखर पर झिलमिलाती
बिंदु रूपा वह-
पावस की दामिनी सी,
अंगूठी में जड़ी हीरकनी सी,
कभी वह-
मोहिनी के हाथों में थामा हुआ
अमृत कलश लगी है,
और कभी-
शिशु की शुभ्र, उज्जवल निष्पाप हंसी
नदी का शैशव
सदा ही मन भाया है।
उछलती, कभी छलांगें भरती,
छलकती-
मुक्त हंसी के फव्वारे सी
अठखेलियां करती चंचल किशोरी सी,
कभी गलबहियां डाले
चट्टानों से कनबतियां कहती
अल्हड़ बाला सी
और कभी-
शांत, सौम्य,ध्यानमग्न मुग्धा सी
निश्छल, निर्द्वन्द्व जीवन की
मोहक इंद्रधनुषी माया सी रस पगी
नदी ने-
हर रूप में, हर पल मुझे लुभाया है।
किंतु मेरे शहर तक आते-आते
न जाने क्यों
वह थक जाती है, मुरझा जाती है।
निर्जीव, मृतप्राय, कृशकाय वह
पसरी रहती है तपती बालू पर
गंधाई, गंदलाई हुई
गली के मुहाने पर पड़ी
लावारिस सड़ी-गली लाश सी।
ऐसे में उसने मुझे
भीतर तक हिलाया है, जार-जार रुलाया है।
“क्यों नहीं उतर आतीं तुम-
मैंने कहा
अपने पर्वत गृह से
सीधे मेरे ही आंगन में?”
“जन्मतः यात्री हूं मैं, वह बोली-
और-
अपनी यात्रा के अंतिम चरण तक आते-आते
हर बार अपने भी कर्मों का
क्षय करती हूं।
बहना मेरा सहज-धर्म है,
बंधन मेरी परिपाटी।
मैंने जब भी अपनी परंपरा तोड़ी है
अपने साथ-साथ
तुम्हारी भी जड़ें खोखली की हैं।
“नीलाकाश के निस्सीम विस्तार में
उन्मुक्त विचरती मैं,
जिस क्षण जा समाई थी विधाता के कमंडल में
पढ़ा था मैंने-
स्वयं को समेटने, सहेजने का
सीमित से असीमित के सृजन का-
जीवन का पहला पा ठ!
दुष्कर था फिर भी
गुंथी थी मैं, बंधी थी शिव के
केशपाश में।
अपनी ही पहचान ढ़ूंढ़ते हुए
सधी-संवरी सी मैं उतरी थी धरा पर,
अपने अस्तित्व को सायास
एक संयमित, सार्थक अभिव्यक्ति देते हुए।
“मेरा उन्मुक्त, निर्बाध प्रवाह झेल पाना
न धरती के तब वश था,
न अब है और न ही कभी होगा।
रुक-रुक कर, थम-थम कर
‘ऊपर से नीचे तक’ आना ही
मेरा शाश्वत सत्य है।
“यह मेरी नियति की विड़ंबना है
कि तब भी तुमने मुझे
अपने कर्मों की राख़ धोने को पुकारा था!
आज भी मैं निरंतर
तुम्हारे पापों की गठरियां धोती हूं
पल-पल, तिल-तिल कर
गलती हूं, गंधाती हूं, गंदलाती हूं
इस पर भी वंद्या हूं !
“और तुम्हारी नियति यह कि
तुम मुझे अंजुरी में भर-
बार-बार
अपनी ही सड़ांध पिए जाते हो
मुक्त की याचना किए जाते हो-
मृत्यु को मेरी स्वर दो
मृत्यु को मेरी स्वर दो !
युगों-युगों से-
मेरी ही वेदना को मानो शब्द दिए जाते हैं।
