मॉं ही चारों धाम
मॉं ही चारों धाम
सदगुण अपने उर में धारे, मूरत में हरि नाम।
दिव्य जगत की माता धरणी, मॉं ही चारों धाम।।
स्वयं पृथा यह मातृ समाना, बालक सम कर नेह।
रज-रज में बन रक्त बहे हैं, बनके हर्षित मेह।।
भाग्य उदित हो अस्ताचल में, आशीषों के शाम।
दिव्य जगत की माता धरणी, मॉं ही चारों धाम।।
सबको सुखमय करते-करते, जर्जर पग तल पॉंव।
मंदिर-मस्जिद हम तुम भटके, उसको मिले न ठॉंव।।
स्वर्ग नर्क का भेद यहीं है, कर लो रे शुभ काम।
दिव्य जगत की माता धरणी, मॉं ही चारों धाम।।
लाठी टेके चलती धीरे, सहती सबका भार।
मॉं ममता की है अवतारी, नमन उसे शत बार।।
लुप्त प्राय होती ममता अब, रक्षित हो शुभ ग्राम।
दिव्य जगत की माता धरणी, मॉं ही चारों धाम।।
रिक्त उदर वह मुस्काती है, भर कर सबका पेट।
रहती आज अनाथालय में , धिक-धिक यह आखेट।।
उसकी देख मशीनों सी गति, तनिक नहीं आराम।
दिव्य जगत की माता धरणी, मॉं ही चारों धाम।।
